ऊपर वाले को धन्यवाद देते मन नहीं भरता! मेरा बचपन सही मायने में बच गया. ज़रा सा लेट हो जाते तो बचपन से ही मशीनी ज़िन्दगी जीनी पड़ती. तो हमें यह मानने में ज़रा भी गुरेज नहीं कि हम इक्कीसवीं सदी में नहीं बल्कि बीसवीं सदी में जन्मे.
जब बोलने समझने वाले हुए तो साधारण बच्चों की तरह 'बुआ', 'बाबा' और 'मम्मा' जैसे शब्द ही फूटे. आजकल तो बच्चे के दो दांत आने से पहले ही उसके हाथ में मोबाइल पकड़ाकर कहते हैं-'बाबू हेलो करो, हेलो!' बाबू भले ही टॉफी समझकर मोबाइल चाटने लगें, लेकिन हेलो कहलाने की यह कोशिश तब तक ज़ारी रहती है जब तक बच्चा किसी एमबीए प्रोफेशनल की तरह फोन कान से सटाकर हेलो न बोलने लगे.
मेरा बचपन बिलकुल बचकाने तरीके से गुजरा. जब समझने वाले हुए तो घर में न तो टीवी था और न ही मोबाइल और टेलीफोन जैसा कोई आकर्षक यंत्र. घर के सामने गाय या कुत्ता भी आ जाता तो मैं ख़ुशी से फुदकने लगता. आधुनिक बच्चों की तरह खिलौनों और चॉकलेट की डिमांड न करके मेरी ज़रुरतें भी मेरी तरह छोटी हुआ करती थीं. रात को आसमान में दिखने वाले चंदा मामा पसंद आ जाते तो हाथ उन्हें पकड़ने को लपकने लगता, दिन भर घर में उछलकूद करते हुए नन्ही सी चींटी तक से दिल लग जाता.
मेरा बचपन बिलकुल बचकाने तरीके से गुजरा. जब समझने वाले हुए तो घर में न तो टीवी था और न ही मोबाइल और टेलीफोन जैसा कोई आकर्षक यंत्र. घर के सामने गाय या कुत्ता भी आ जाता तो मैं ख़ुशी से फुदकने लगता. आधुनिक बच्चों की तरह खिलौनों और चॉकलेट की डिमांड न करके मेरी ज़रुरतें भी मेरी तरह छोटी हुआ करती थीं. रात को आसमान में दिखने वाले चंदा मामा पसंद आ जाते तो हाथ उन्हें पकड़ने को लपकने लगता, दिन भर घर में उछलकूद करते हुए नन्ही सी चींटी तक से दिल लग जाता.
पड़ोस में रहने वाली ताई ने घर के बगल सब्जियां और टमाटर, धनिया के पौधे लगा रखे थे. उन्हें देखते ही 'ताई, दनिया...' कहकर मैं मासूम सी आवाज़ में सिफारिश करता वो हंसकर चार पत्तियां मेरे हाथ पर देतीं. सोचता हूं आजकल के बच्चों के हाथ पर कोई धनिया की पत्तियां रखे तो उसे घास समझ 'व्हाट हैव यू डन' जैसा मुहं बनाएंगे. बेफिक्र और बेशर्म मिज़ाज़ के हम हमेशा से ही फक्कड़ रहे, आज भी हैं.
एक वक़्त को तो बड़ा मुश्किल होता था लेकिन अब बच्चों को स्मार्ट बनाना आसान हो गया है. या तो उन्हें गैजेट्स के हवाले कर दें, या फिर टीवी के सामने बैठा दें. कितना कुछ वहीँ से सीखने को मिल जाता है. हमारा वक़्त ही कुछ अलग था टीवी तक से रूबरू ज़रा देर से हुए. जितना कुछ सीखने को मिला बस आसपास देखकर सीख लिया. फिर चाहे वो तोतली आवाज़ में कविता सुनाना हो या फिर झोला उठाकर पढ़ने निकल जाना.
खैर अच्छा ही हुआ जो बचपन में ही स्मार्ट फ़ोन और स्मार्ट टीवी से इंट्रोड्यूस नहीं हुए, वरना पत्रकार बनने का जज़्बा छोड़ ज़िन्दगी इन्हीं के हवाले कर चुके होते। पत्रकार बनते भी तो ख़बरें ऑफिस में बैठे बैठे आंख मूंदकर बनाते न कि लोगों के बीच जाकर...

