Monday, 17 October 2016

गनीमत रही बचपन सेल्फी और बाबू हेलो करो से बच गया...


             ऊपर वाले को धन्यवाद देते मन नहीं भरता! मेरा बचपन सही मायने में बच गया. ज़रा सा लेट हो जाते तो बचपन से ही मशीनी ज़िन्दगी जीनी पड़ती. तो हमें यह मानने में ज़रा भी गुरेज नहीं कि हम इक्कीसवीं सदी में नहीं बल्कि बीसवीं सदी में जन्मे. 
           जब बोलने समझने वाले हुए तो साधारण बच्चों की तरह 'बुआ', 'बाबा' और 'मम्मा' जैसे शब्द ही फूटे. आजकल तो बच्चे के दो दांत आने से पहले ही उसके हाथ में मोबाइल पकड़ाकर कहते हैं-'बाबू हेलो करो, हेलो!' बाबू भले ही टॉफी समझकर मोबाइल चाटने लगें, लेकिन हेलो कहलाने की यह कोशिश तब तक ज़ारी रहती है जब तक बच्चा किसी एमबीए प्रोफेशनल की तरह फोन कान से सटाकर हेलो न बोलने लगे.

  
   मेरा बचपन बिलकुल बचकाने तरीके से गुजरा. जब समझने वाले हुए तो घर में न तो टीवी था और न ही मोबाइल और टेलीफोन जैसा कोई आकर्षक यंत्र. घर के सामने गाय या कुत्ता भी आ जाता तो मैं ख़ुशी से फुदकने लगता. आधुनिक बच्चों की तरह खिलौनों और चॉकलेट की डिमांड न करके मेरी ज़रुरतें भी मेरी तरह छोटी हुआ करती थीं. रात को आसमान में दिखने वाले चंदा मामा पसंद आ जाते तो हाथ उन्हें पकड़ने को लपकने लगता,  दिन भर घर में उछलकूद करते हुए नन्ही सी चींटी तक से दिल  लग जाता.

           पड़ोस में रहने वाली ताई ने घर के बगल सब्जियां और टमाटर, धनिया के पौधे लगा रखे थे. उन्हें देखते ही 'ताई, दनिया...' कहकर मैं मासूम सी आवाज़ में सिफारिश करता  वो हंसकर चार पत्तियां मेरे हाथ पर  देतीं. सोचता हूं आजकल के बच्चों के हाथ पर कोई धनिया की पत्तियां रखे तो उसे घास समझ 'व्हाट हैव यू डन' जैसा मुहं बनाएंगे. बेफिक्र और बेशर्म मिज़ाज़ के हम हमेशा से ही फक्कड़ रहे, आज भी हैं.

            एक वक़्त को तो बड़ा मुश्किल होता था लेकिन अब बच्चों को स्मार्ट बनाना आसान हो गया है. या तो उन्हें गैजेट्स के हवाले कर दें, या फिर टीवी के सामने बैठा दें. कितना कुछ वहीँ से सीखने को मिल जाता है. हमारा वक़्त ही कुछ अलग था टीवी तक से रूबरू ज़रा देर से हुए. जितना कुछ सीखने को मिला बस आसपास देखकर सीख लिया. फिर चाहे वो तोतली आवाज़ में कविता सुनाना हो या फिर झोला उठाकर पढ़ने निकल जाना. 

         खैर अच्छा ही हुआ जो बचपन में ही स्मार्ट फ़ोन और स्मार्ट टीवी से इंट्रोड्यूस नहीं हुए, वरना पत्रकार बनने का जज़्बा छोड़ ज़िन्दगी इन्हीं के हवाले कर चुके होते। पत्रकार बनते भी तो ख़बरें ऑफिस में बैठे बैठे आंख मूंदकर बनाते न कि लोगों के बीच जाकर... 

Friday, 8 July 2016

कहानी तो तब शुरू हुई, जब मैं दुनिया में आया : जन्म

          शोले फिल्म का एक चर्चित डायलॉग है, 'बहुत नाइंसाफी है रे.' ये बात साफ़ लागू होती है हम सब पर. सबसे अनोखा पल होता है, जब हम इस दुनिया में कदम रखते हैं. न तो इस दुनिया में आने का हमें कुछ याद रहता है  यहाँ से जाने का पता. खैर जो भी हो, आत्मकथा मेरी है तो जन्म की कहानी भी मैनेज करनी ही पड़ेगी.
      सांस्कृतिक रूप से संपन्न देश भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में एक जिला है बाराबंकी. प्रदेश की राजधानी लखनऊ से लगभग 26 किमी की दूसरी पर इस जिले का मुख्यालय है. आज सूरत और हालात बदल चुके हैं लेकिन तब यह उतना विकसित नहीं था. एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार जिसमें अब तक पांच सदस्य, मेरे दादा जी, बुआ, मां-पापा और दीदी थे, यहां मैं कदम रखने जा रहा था. दस अगस्त को उस रोज़ शायद शनिवार का दिन था, सुबह के सूरज के साथ ही एक और सूरज उदित होने जा रहा था. परिवार का कुलदीपक!
 

इससे पहले कि आपको लगे मैं अपने मुंह मियां मिट्ठू बन रहा हूँ, बता दूँ कि मैंने खुद को सूरज कहा क्योंकि मुझे पहला नाम यही दिया जा रहा था. उस दिन सूरज निकलता इससे पहले ही बारिश होने लगी, टिपटिप बारिश की  बूंदे बरसकर मानों यह एहसास दिला रही थीं कि ऊपरवाला भी मुझे खुद से दूर नीचे भेजकर दुखी था. सबसे ज़्यादा खुश अगर कोई था तो मेरा परिवार. बहुत ज़्यादा तो याद नहीं लेकिन जितना दिमाग पर जोर डालने से याद आता है कि हम नन्हे से थे और कुछ समझने के लायक नहीं थे, तो बेवजह रोए जा रहे थे. पहले पता होता ज़िन्दगी रोने के इतने मौके लेकर आएगी तो कसम से चूं तक न करते.
              मेरी दीदी जो उस वक़्त पांच साल की हुआ करती थीं, छोटा भाई पाकर बहुत खुश हुईं. आखिर कुछ दिनों बाद राखी जो थी, और उससे पहले मम्मी ने इतना प्यारा उपहार जो दिया था. मुझे नहीं लगता कि एक शख्स के एहसास मैं शब्दों के ज़रिये यहां लिख सकता हूं, और वो हैं मेरी प्यारी मां. तो कोशिश करना भी इस रिश्ते का कद छोटा करने जैसा होगा.
         एक नन्हे बच्चे को सबसे पहले किस चीज़ की ज़रुरत होती है! आप कुछ भी कहें पर मैं कहता हूँ नाम. बाबू, मुन्ना और चुन्नू जैसे नाम तो बाई डिफ़ॉल्ट मिल जाते हैं लेकिन कायदे का नाम देने के लिए अच्छी खासी मशक्कत करनी पड़ती है. तो काफी सोच विचार के बाद हमें भी अलग-अलग लोगों ने नाम दिए. घर पर सबने बुलाया अमन तो मौसा जी ने छोटू.
          पर जिस नाम ने मुझे सार्थक किया वो नाम मुझे मेरे दादा जी ने दिया- 'प्राणेश'. बोलने में ज़रा मुश्किल और ओल्ड फैशन लग सकता है लेकिन इस नाम से मैं पूरी तरह संतुष्ट हूँ. खासकर इसलिए क्योंकि मुझे इसी नाम के दो और शख्स क्लास में नहीं मिलते. आज भी इस नाम को जी रहा हूँ, कुछ लोगों को जीना सिखा रहा हूँ तो कुछ को जीने की वजह दे रहा हूँ.
        तो कुछ इस तरह मैंने इस अनोखी दुनिया में कदम रखा और यहां एक कहानी मेरी भी शुरू हो गयी. एक व्यक्तित्व, एक विचारधारा, एक लेखनी, एक कोशिश, एक ज़िद, एक लगन और एक पत्रकार का जाने अनजाने पदार्पण हुआ.